01 जुलाई, 2009

छोटा सा शून्य .
मैँने जाना अपना जीवन , जैसे कोरी-कोरी तङपन
रातें कोरी दिन है कोरा , सांसें कोरी ,कोरी धङकन
इक छोटा सा शून्य है अन्दर
जैसे अथाह हो पीर समन्दर
ऐसा लगता है जैसे कुछ छूटा-छूटा जाता हो
दिल का जाने कौनसा कोना टूटा-टूटा जाता हो
जो पूरी दुनियाँ को बाँधे वो रेशम के तार कहाँ है
हर छटा निराली हो जिसकी खोया सा प्यार कहाँ है
वो खोया सा प्यार कहाँ है, कहाँ है प्यारे वो भक्ती
मेरा नाम भी तू भूला सा है जो सारी सृष्टि की शक्ति
कोशिश कर कर के मैं तुझे अपनी याद दिलाता हूँ
जब तू करता है मुझे याद मैं दौङ-दौङ कर आता हूँ
क्यूं लगता है जाने मुझको मैं खुद ही से घबराता हूँ
मैं इक छोटा सा टुकङा , कभी मैं ही संसार बनाता हूँ
कोई मेरा आकार नहीं है शून्य हूँ जब खुद मैं ईश्वर
क्या अस्तित्व किसी का तब है सबकुछ यहाँ पर है नश्वर
मैं संसार बनाता हूँ मैं रचनाकार हूँ इस जल-थल का
हर पल में साकार मैं खुद निराकार हूँ पल पल का
पल का जीवन मिला है तुझको पल ही में छिन जाना है
शून्य अथाह को भूल के प्यारे जीवन भर मुस्काना है

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